नोबल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई का असली चेहरा

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मलाला यूसुफजई का दोहरा चरित्र

पाकिस्तान के सिंध में दो हिंदू लड़कियों का अपहरण और ज़बरदस्त धार्मिक रूपांतरण अल्पसंख्यक अधिकारों के साथ अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है जो लगातार उपमहाद्वीप के देशों में घट रहे हैं। हालांकि, पाकिस्तान के नोबल शांति पुरस्कार धारक मलाला यूसुफजई को इस मामले के बारे में बोलने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है।

भारतीय यूजर को ब्लॉक किया

एक भारतीय ट्विटर उपयोगकर्ता, जिसका यूजरनेम कृष्णा है, ने जबरदस्त रूप से मलाला से जबरन धर्म परिवर्तन की घटना पर अपने विचार पूछे और पीड़ितों के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए उसका समर्थन मांगा। उसने ट्वीट किया कि “@ मलाला, आपकी उम्र की दो हिंदू लड़कियों को उनके घर से अगवा कर लिया गया, छेड़छाड़ की गई और जबरदस्ती आपके धर्म, इस्लाम में परिवर्तित कर दिया गया। इस्लामवादियों के इस बर्बर कृत्य के बारे में दुनिया को पता होना चाहिए। कृपया उन दो गरीब हिंदू लड़कियों के समर्थन में आये, धन्यवाद “

हालांकि, ट्वीट पर कोई जवाब देने या इसे रीट्वीट करने के बजाय, मलाला ने ट्विटर उपयोगकर्ता को बहुत आश्चर्यजनक रूप से अवरुद्ध कर दिया।

अन्य यूज़र्स ने भी सवाल किया

इस बीच, पत्रकार आरती टीकू सिंह ने भी इस मामले पर मलाला की चुप्पी पर ट्वीट किया। और पाकिस्तान में दो भोली-भाली लड़कियों के लिए आवाज उठाने का अनुरोध किया। “प्रिय @ ममाला, जब आप अपने व्यस्त कार्यक्रम से थोड़ा मुक्त होते हैं, तो कृपया रवीना और रीना जैसी लड़कियों के लिए अपनी आवाज़ उठाएं, जिनका जबरन धर्म परिवर्तन किया जा रहा हैं और बलात्कार की प्रतीक्षा कर रहे पुरुषों से शादी करवाई जा रही हैं। उनके पिता की असहाय रोने की आवाज़ सुनो और पाकिस्तान सेना से सवाल करने की हिम्मत करो, ”उसने लिखा।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक महिलाएँ

दो लड़कियों को होली की पूर्व संध्या पर सिंध में घोटकी जिले में उनके घर से “प्रभावशाली” पुरुषों के एक समूह द्वारा अपहरण कर लिया गया था। अपहरण के तुरंत बाद, एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक मौलवी को कथित रूप से दो लड़कियों के निकाह (शादी) को दिखाते हुए दिखाया गया था।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इलाके में हिंदू समुदाय ने कथित अपराध के लिये अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन किया।

भारत पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों विशेषकर हिंदू समुदाय की दुर्दशा का मुद्दा उठाता रहा है।

नोबल पुरस्कार पर उठे सवाल

मलाला यूसुफजई को नोबल का शान्ति पुरस्कार दिया गया है। दुनिया में यह माना जाता है कि वो महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए काम करती है। बल्कि हक़ीक़त यह है कि मलाला केवल मुस्लिम औरतों के हितों के लिए काम करती है। इसके अलावा कभी भी अन्य समुदायों पर अत्याचार के लिए इस्लामिक कट्टरपंथियों का विरोध नही करती है। न्यूजीलैंड में एक मस्जिद पर जब हमला हुआ तो मलाला ने ट्वीट करते हुए दुःख व्यक्त किया। लेकिन मलाला ने कभी भी इस्लामिक आतंकियो द्वारा किये गए नरसंहार पर अपनी प्रतिक्रिया नही दी।

निष्कर्ष

दरअसल मलाला युसूफ जाई दुनिया में इस्लाम को शांति के मजहब के रूप में पेश करती है। लेकिन पुलवामा और 26/11 जैसे इस्लामिक आतंक की निंदा नही करती है। मलाला द्वारा पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओ के अधिकारों के लिए सवाल पूछा गया तो उसने यूज़र्स को ब्लॉक कर दिया। इससे उसकी गैर मुस्लिम विरोधी और इस्लामिक कट्टरता की झलक देखने को मिलती है। दरअसल मलाला महिला अधिकारों की आड़ में गैर मुस्लिम औरतों को इस्लाम अपनाने के लिए प्रेरित करती है। एक तरह से केवल और केवल इस्लाम के प्रचार का काम करती है।

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