कांग्रेस ने कराई हेमंत करकरे और उसकी पत्नी की हत्या

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हेमंत करकरे और 26/11 आतंकी हमला

Hemant Karkare’s Murder Mystery : इस लेख में हम बताने वाले है कि हेमंत करकरे को वाकई आतंकियो ने मारा या उनकी राजनीतिक हत्या की गयी। हेमंत करकरे की मौत से जुड़े बड़े खुलासे इस लेख में हम करने जा रहे है। 26 नवम्बर 2008 को हेमंत करकरे के साथ घटे पुरे घटनाक्रम की सच्चाई का वर्णन कुछ इस प्रकार है।

रात 9.45 बजे। 26 नवंबर 2008 को, अपने दादर निवास पर रात्रि भोज करते हुए, करकरे को छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (C.S.T) स्टेशन पर आतंकवादी हमले के बारे में एक कॉल आया। उन्होंने टीवी पर खबरों के लिए स्विच किया । अपने ड्राइवर और बॉडीगार्ड के साथ एक बार सी.एस.टी. पहुंचे, वहाँ उन्हें एक बुलेट-प्रूफ जैकेट और हेलमेट दिया गया (न्यूज चैनलों पर दिखाया गया है) और फिर वे प्लेटफार्म नंबर 1 पर गए, लेकिन वह सुनसान मिला। उसके बाद उन्हें सूचित किया गया कि आतंकवादी आज़ाद मैदान पुलिस स्टेशन के बगल में स्थित कामा और एल्बलेस अस्पताल (“कामा”) में चले गए।

Hemant Karkare on 26/11 Attack

ऑपरेशन मुश्किल था क्योंकि वहां अंधेरा बहुत था और आतंकवादी अच्छी तरह से तैयार थे, वस्तुतः एक फिदायीन मिशन पर थे। कुछ अधिकारी और कांस्टेबल, पीछे से कामा में चले गए। कुछ कांस्टेबलों को कामा के पीछे प्रवेश द्वार पर तैनात किया गया था, जबकि बाकी एक क्वालिस जीप में सवार थे। वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर विजय सालस्कर ने क्वालिस के ड्राइवर को व्हील पर ले जाने के लिए कहा। उसी समय, उन्होंने वायरलेस पर सुना कि आतंकवादी एक लाल कार के पीछे छिपे हुए थे।

जैसे ही वे क्राइम ब्रांच के दफ्तर से रंग भवन की ओर लाल कार की तलाश में निकले, कॉर्पोरेशन बैंक के एटीएम के पास, उन्होंने एक आतंकवादी को भागते हुए देखा। अशोक काम्टे, मुंबई पूर्व के एसीपी, सालस्कर ने फायर किए, गोलीे आतंकी के हाथ पर लगी, उसकी AK-47 नीचे गिर गई। वह आतंकी कसाब था, अकेला आतंकवादी जो बाद में जिंदा पकड़ा गया। जब वे नीचे उतरने की सोच रहे थे, एक दूसरे आतंकवादी इस्माइल खान ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। कांस्टेबल जाधव को छोड़कर, सभी की मृत्यु हो गई।

हेमंत करकरे की मौत की गुत्थी

हेमंत करकरे, अशोक कामटे, सालस्कर और अन्य लोग मुंबई हमले में लड़ते हुए मारे गए। मीडिया में कॉन्स्टेबल अरुण जाधव के बयानों को उद्धृत किया गया, जो अधिकारियों हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक कामटे के साथ थे जब उनकी मौत हो गई थी।
जाधव ने बताया कि हमें सूचना मिली थी कि सदानंद दाते, महिलाओं और बच्चों को बचाते हुए कामा और एल्बलेस अस्पताल में गोलियों से घायल हो गए हैं। छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) में स्थित, अस्पताल से दस मिनट की ड्राइव पर, उन्होंने एक टोयोटा क्वालिस ली और उस दिशा में आगे बढ़े। सलास्कर गाड़ी चला रहा था, यात्री सीट में कामटे, दूसरी पंक्ति में करकरे और जाधव सहित चार कांस्टेबल बैठने की पिछली पंक्ति में थे। जाधव के अनुसार, पांच मिनट बाद, दो आतंकवादियों ने एक पेड़ के पीछे से अचानक आये और एके -47 स्वचालित राइफलों से गोलीबारी की। छह पुलिसकर्मी, जाधव के अलावा, सभी को गोलियों से भून दिया गया। काम्टे एकमात्र अधिकारी थे जो आतंकवादी अजमल के सामने जवाबी कार्रवाई करने में सफल रहे। घायल जाधव के पास सहायता प्रदान करने का कोई अवसर नहीं था। दोनों आतंकवादी वाहन के पास पहुंचे, उन्होंने तीन अधिकारियों के शवों को सड़क पर फेंक दिया। घायल कॉन्स्टेबलो को छोड़कर मेट्रो सिनेमा की ओर बढ़ गए। उन्होंने पुलिस पर स्वचालित आग के तीन विस्फोट किए और उस स्थान पर आये वाहन को कब्जे में लिया, फिर दक्षिण मुंबई के सरकारी कार्यालयों (विधान भवन) की ओर प्रस्थान किया। यहां फिर से उन्होंने कई बार गोलीबारी की।

क्षेत्र छोड़ने का प्रयास करते समय, वाहन के टायरों में से एक फट गया, इसलिए आतंकवादी दूसरे को प्राप्त करने के लिए रवाना हो गए। इस समय पर, जाधव मुख्यालय से संपर्क करने में सक्षम हुए। मृतकों के शवों को बरामद कर सेंट जॉर्ज अस्पताल ले जाया गया। हालाँकि कांस्टेबल जाधव द्वारा दिए गए बयान विश्वसनीय नहीं थे क्योंकि माननीय अदालत ने कहा था। कांस्टेबल जाधव ने अपने बयान बदले और उन्हें अतिरंजित भी किया। इसलिए उनके बयान को आंशिक रूप से खारिज कर दिया गया था। न्यायाधीश एम एल तहलियानी ने उन्हें ‘झूठा’ भी कहा। करकरे की मौत में महत्वपूर्ण सबूत – उनके शरीर में गोली लगने का स्रोत अनुपस्थित था। गोलियां आतंकवादी के कुछ बरामद बंदूकों के साथ मेल नहीं खातीं, जिससे यह तय करना असंभव हो गया कि आतंकवादियों में से किसने हेमन्त करकरे की हत्या की थी। एक जांच में, भारतीय समाचार एजेंसी हेडलाइन टुडे ने पाया कि श्री करकरे को एक घटिया बुलेटप्रूफ जैकेट जारी किया गया था। हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, जैकेट की गुणवत्ता उसकी मौत का कारक नहीं थी क्योंकि गोलियों ने जैकेट को छेद नहीं दिया था। जैकेट की गुणवत्ता के बारे में मीडिया में चिंताएँ जारी हैं  क्योंकि जैकेट खुद भारतीय अधिकारियों के अनुसार अस्पताल में गलत तरीके से रखा गया था। 2018 में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक लंबित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि करकरे को आतंकवादियों अजमल कसाब और अबू इस्माइल द्वारा नही मारा गया था।

कांस्टेबल जाधव के द्वारा बार बार बयान बदलने से हेमंत करकरे की हत्या का शक और गहरा हो जाता है। आखिर हेमंत करकरे को आतंकियो ने नही मारा तो क्या किसी पुलिस वाले ने उनकी हत्या की? क्या किसी बड़े राजनेता के इशारे पर उनकी हत्या हुई ? आतंकी हमले की आड़ में उनकी हत्या करवाने के पीछे क्या उद्देश्य था?

हेमंत करकरे – एक राजनीतिक कठपुतली

8 सितंबर 2006 को, महाराष्ट्र के मालेगाँव में बम विस्फोटों की एक श्रृंखला हुई। पुलिस ने इन मालेगाँव धमाकों के लिए कुछ मुस्लिम संदिग्धों को गिरफ्तार किया, इस तथ्य के बावजूद कि पीड़ित सभी मुस्लिम थे और जिन साइकिलों पर बमों को हिंदू नाम दिया गया था। लेकिन बाद में जाँच में पाया गया कि यह सभी फर्जी नाम थे । तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के साथ अन्य कांग्रेस नेताओ ने इसे “भगवा आतंक” का नाम दिया । 29 सितंबर 2008 को, मोदासा, गुजरात और मालेगाँव, महाराष्ट्र में तीन बम विस्फोट हुए और आठ लोग मारे गए और 80 लोग घायल हो गए। अहमदाबाद, गुजरात में कई बम पाए गए। हेमंत करकरे, राज्य के आतंकवाद-रोधी दस्ते के प्रमुख के रूप में, 2008 के मालेगाँव विस्फोटों की जाँच का नेतृत्व कर रहे थे। अक्टूबर 2008 के अंत में, एटीएस ने ग्यारह संदिग्धों को गिरफ्तार किया, जिसमें एबीवीपी के एक पूर्व छात्र नेता साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, स्वामी अमृतानंद उर्फ ​​दयानंद पांडे, एक सेवानिवृत्त मेजर रमेश उपाध्याय और एक सेवारत सेना अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित शामिल थे। अधिकांश आरोपी संघ परिवार संगठनों के पूर्व संबंधों के साथ अभिनव भारत नामक एक हिंदुत्व समूह से संबंधित थे। करकरे की एटीएस ने पहली बार हिंदुत्व संगठनों के भारत में आतंकवाद के लिए जिम्मेदार होने के रूप में पहचान की और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने इसे हिंदुत्व आतंक या भगवा आतंक कहना शुरू कर दिया।

भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना और हिंदू संगठनों सहित विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि भारत की मुस्लिम आबादी को खुश करने के प्रयास में गिरफ्तारी कट्टरपंथी सरकार के दबाव में की गई थी। इन दलों ने उन्हें इस दिशा में उनकी जाँच के लिए ‘राष्ट्र के लिए एक गद्दार’ कहा। नरेंद्र मोदी, तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री ने एटीएस पर सैन्य मनोबल को कम करने का आरोप लगाया। कुछ भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के नेताओं ने एटीएस पर संघ परिवार पर हमला करने और अवैध हिरासत और यातना का उपयोग करने के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किए जाने का आरोप लगाया।

26/11 – कांग्रेस के राजनेताओं का षड्यंत्र

2006 में कांग्रेस के कुछ नेताओं ने हिन्दू आतंकवाद साबित करने का षड्यंत्र किया। मालेगांव ब्लास्ट 2006 इस कड़ी में पहला प्रयास था, जो बुरी तरह फैल हो गया। उसके बाद भी देश में कई जगह बम धमाके हुए। लेकिन 2008 में फिर से मालेगांव और गुजरात के मोदासा में धमाके हुए। इस बार कांग्रेस के बड़े नेताओं के इशारे पर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर,स्वामी अमृतानंद उर्फ ​​दयानंद पांडे, एक सेवानिवृत्त मेजर रमेश उपाध्याय और एक सेवारत सेना अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित को गिरफ्तार किया गया। पूर्व नियोजित षड्यंत्र के तहत साध्वी प्रज्ञा के नाम की साइकिल जुटाई गयी। उसके बाद मालेगांव में बम धमाके किये गए। इस पुरे षड्यंत्र में हेमंत करकरे ने कांग्रेस नेताओं के इशारे पर जाँच को प्रभावित किया।

भारतीय सेना के कर्नल पुरोहित को जो आर्मी इंटेलिजेंस के कार्य में लगे थे। वे आतंकवादियों के समूह में इनफील्ट्रेट कर गए थे और जासूसी कर जानकारियां एकत्र कर रहे थे। कर्नल पुरोहित को फंसाने वाले और फर्जी RDX प्लांट करने वाले हेमंत करकरे थे। हेमंत करकरे ने ही कर्नल पुरोहित पर झूठा आरोप लगाया कि उन्होंने सेना का RDX चुराया और बम धमाके में इस्तेमाल किया, परंतु क्योंकि हेमंत करकरे एक ऐसे आईपीएस अधिकारी थे जिन्हें पता ही नहीं था कि इंडियन आर्मी आरडीएक्स इस्तेमाल ही नहीं करती, इसीलिए उनका झूठ बाद में पकड़ा गया और कर्नल पुरोहित निर्दोष साबित हुये।

यह भी खुलासा हुआ कि हेमंत करकरे सीधे कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह से निर्देश लेकर जांच आगे बढ़ा रहे थे, जो उनके पक्षपाती होने और कांग्रेसी इशारों पर कार्य करने वाले प्यादे के रूप में स्थापित करता है। हेमंत करकरे ने साध्वी ठाकुर और कर्नल पुरोहित को प्रतिदिन प्रताड़ित किया थर्ड डिग्री दी। कर्नल पुरोहित के मात्र एक पैर में ही हड्डियां 43 जगह से टूटी हुई थी और साध्वी ठाकुर की तो रीढ़ की हड्डी ही मार मार कर तोड़ दी गई थी।

यह सब कुछ केवल इनसे झूठे इकबालिया बयान दिलवाने के लिए किया गया था, कांग्रेस नेताओ का उद्देश्य था मुस्लिम वोट बैंक को प्रसन्न करने के लिए हिंदुओं के ऊपर आतंकवादी होने का ठप्पा लगा दिया जाए।

26/11 के बाद करकरे की पत्नी की हत्या

हेमंत करकरे की पत्नी ने 26/11 मुम्बई आतंकी हमले के बाद बड़े खुलासे किए थे। उन्होंने कहा कि उनके पति हेमंत करकरे राजनीतिक दबाव में काम कर रहे थे। उनके पति ने कई बार उनको बताने की कोशिश भी की थी कि उनकी जान को खतरा है। अगर वे सच बोलेंगे तो उनके परिवार को खतरा है। इसलिए अपनी पत्नी और बच्चों की रक्षा के लिए वे राजनीतिक दबाव में काम कर रहे थे। हेमंत करकरे ने मालेगांव ब्लास्ट के 1 महीने बाद इस राजनीतिक षड्यंत्र को मीडिया के सामने लाने का मन बना लिया था। लेकिन उसी वक़्त 26/11 आतंकी हमला हुआ। इस आतंकी हमले की आड़ में हेमंत करकरे को षड्यंत्र के तहत मार दिया गया। करकरे की पत्नी का मानना था कि आतंकियो ने उनके पति को नही मारा। मेडिकल जांच में उनके शरीर से मिली गोलियां भी आतंकियो द्वारा इस्तेमाल हथियारों से मेल नही खा रही थी। करकरे की हत्या के प्रत्यक्ष दर्शी कांस्टेबल जाधव ने भी बार बार बयान बदले। इससे जाधव के इस हत्या में शामिल होने का शक पैदा होता है क्योंकि अगर आतंकियो से उनकी मुठभेड़ हुई तो आतंकियो ने केवल उनको ही जिन्दा कैसे छोड़ा?

Hemant Karkare’s wife

करकरे की पत्नी कविता करकरे को 27 सितंबर 2014 को बड़े पैमाने पर ब्रेन हैमरेज हुआ और वह जल्द ही कोमा में चली गईं। इसके बाद वह 29 सितंबर 2014 को 57 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वह हिंदू कॉलोनी, दादर में रहती थी और एनएसएस बी.एड कॉलेज, तारदिओ में एक प्रोफेसर थी, लेकिन कुछ महीने पहले काम छोड़ दिया और उच्च रक्तचाप से पीड़ित थी।

लेकिन हमारी तहकीकात में यह सामने आया है कि हेमंत करकरे की पत्नी की मौत प्राकृतिक नही थी। दरअसल कविता करकरे लगातार एक के बाद एक खुलासे कर रही थी। इसलिए राजनीतिक साजिश के तहत उनकी कॉलेज छुड़वाई गयी। इसके बाद उनके घर पर उन्हें कई सालों तक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। कविता करकरे को उनके परिवार की हत्या का डर दिखाकर कई सालो तक टॉर्चर किया गया। आखिर में उनकी मानसिक शक्ति कमजोर हो गयी और उनकी सितम्बर 2014 में मौत हो गयी। लेकिन यह कोई प्राकृतिक मौत नही, बल्कि कई सालों के मानसिक टॉर्चर द्वारा की गयी हत्या थी। ताकि हेमंत करकरे की हत्या का राज कभी सामने न आ सके।

हेमंत करकरे को आतंकियो ने नही मारा

अब यदि बात 26/11 आतंकी हमले में हेमंत करकरे के मारे जाने की करें, तो हेमंत करकरे कॉम्बैट के समय नहीं मरे थे। जीप में बैठकर परिस्थिति का जायजा लेने गए हेमंत करकरे, विजय सालस्कर, अशोक काम्पटे पर आतंकवादियों ने AK 47 से फायरिंग कर दी थी। केवल अशोक काम्पटे ही जीप से कूदकर उतर पाये थे और काउंटर फायरिंग की थी। कांस्टेबल जाधव के अलावा, सब उसी फ़ायरिंग में मारे गए थे। हेमंत करकरे को गले और कंधे पर गोलियां लगी थी जिससे वह मारे गए। लेकिन मेडिकल जांच में यह साबित नही हुआ कि आतंकियो ने ही हेमंत करकरे को गोलियां मारी थी।

26/11 कॉम्बैट में असली वीरता का परिचय देने वाले थे मुंबई पुलिस कांस्टेबल तुकाराम ओंबले जिन्होंने हाथ में मात्र एक लाठी लेकर एके-47 से गोलियां चलाने वाले अजमल आमिर कसाब को पकड़ा था। अपनी छाती पर उन्होंने AK 47 का एक पूरा बर्सट फायर झेला था उसके बावजूद अजमल कसाब को नहीं छोड़ा।
यदि तुकाराम ओम्बले ने कसाब को जिंदा नहीं पकड़ा होता तो कांग्रेस ने 26/11 आतंकी हमले का आरोप हिंदुओं पर मढ़ दिया होता । क्योंकि सभी जेहादी आतंकवादी अपने हाथों में कलावा और गले में हिंदू भगवानों के लॉकेट बांध कर आए थे। तुकाराम ओंबले अपने प्राणों का बलिदान देकर देश के सभी हिंदुओं को आतंकवाद के कलंक से बचा गए थे।
कॉम्बैट में वीरगति प्राप्त करने वाले दूसरे व्यक्ति थे एनएसजी कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन जिन्होंने अपने साथियों की जान बचाने हेतु उन्हें ऊपर आने से मना कर कहा था “ऊपर मत आओ मैं संभाल लूंगा”

जब तक कसाब जिन्दा नही पकड़ा गया था तब तक मीडिया में सभी आतंकियो को हिन्दू बताया गया था। इसके पीछे बड़ा कारण था कि उस समय की कांग्रेस सरकार के गृहमंत्री ने खुद उन्हें हिन्दू आतंकी घोषित कर दिया था। कुछ अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसे आरएसएस का हिन्दू आतंकवाद बताया था। लेकिन कसाब ने जब अपनी और अपने साथियों की असली पहचान बतायी तो कांग्रेस का हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी फिर से फैल हो गयी।

अब सवाल यह उठता है कि 2006 से 2008 में हिन्दू आतंकवाद थ्योरी को जन्म देने की साजिश की गयी। इस साजिश के शिकार साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित जैसे लोग हुए। इस साजिश को झुपाने के लिए 26/11 आतंकी हमला ISI और भारत में बैठे उनके आकाओं के इशारे पर किया गया। इस हमले की आड़ में हिन्दू आतंकवाद को साबित करने का बड़ा प्रयास किया गया? क्या 26/11 हमले में हिन्दू आतंकवाद के षड्यंत्र के प्रत्यक्ष साक्षी हेमंत करकरे को मारा गया?
यह सवाल आज हर भारतीय के मन में उठ रहे है।

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